Monday, August 30, 2021

परिचय

 सुमन शर्मा, अजमेर। 

शैक्षणिक योग्यता- हिंदी साहित्य व दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर, बी एड, एमजेएमसी। 

अध्यवसाय व अनुभव - 16 वर्ष तक सक्रिय पत्रकारिता व 24 वर्षों से अध्यापन। 

वर्तमान में माहेश्वरी पब्लिक स्कूल, अजमेर में हिंदी विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत। अजयमेरु प्रैस क्लब की सक्रिय सदस्य व कार्यकारिणी सदस्य।

अभिरुचि-अध्ययन-अध्यापन, लेखन, संगीत, नृत्य, मुशायरा, कवि सम्मेलन तथा कार्यक्रम संचालन।

विशेष- मधुबन प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा बाल मनोविज्ञान पर आधारित कहानी 'नई दिशा' विशेष निर्णायक पुरस्कार से पुरस्कृत।  

दो काव्य संग्रह- 'एहसास' और 'महकते ख्वाब' ।

Tuesday, August 24, 2021

पिता की स्मृति में

 

मेरे पापा  

पापा आप थे तो नई उमंग से चहक उठती थी मैं, 

हर पल नई ऊर्जा से दमक उठती थी मैं। 

आज भी आपकी यादों से महकती हूं मैं, 

पर नहीं चहक पाती पहले जैसे चहकती थी मैं।

आपके होने पर रहती थी आंखों में चमक, 

आप थे तो बुलंद हौसलों की धनी थी मैं।

आपके होने पर रहता था मन में संतोष, 

चमक तो है आज भी पर हौसलों की कमी हो जैसे। 

आप थे तो कभी नहीं रहती थी मैं उदास, 

मन में रहती थी आस हर पल था विश्वास। 

आज भी बटोरती हूं साहस, मन चाहता है करना विश्वास। 

पर मन है बहुत उदास क्योंकि पापा आप नहीं हो पास। 

यह जान लिया है मैंने मेरी पूरी दुनिया थे आप, 

आप नहीं हो तो कुछ भी नहीं है अब खास। 

कमी नहीं है इरादों की पर आंखों में नमी है, 

पापा आपकी हर जगह जिंदगी में कमी है।

कैसे बयां करूं आप क्या-क्या थे मेरे लिए, 

लगता है अब खाली है हाथ कुछ भी नहीं मेरे पास। 

आ जाओ ना पापा यह दिल है बहुत उदास, 

अभी तक महके हुए हैं आपकी यादों के एहसास।

पिता एक उम्मीद होते हैं जो हर पल हमें राह दिखाते हैं। 

जीवन के अधियारों में रोशनी बन छा जाते हैं।

सुमन शर्मा, अजमेर

मुझे मेरा वह दीवाना बहुत अच्छा लगा

 फूल का कलियों से रूठना मनाना अच्छा लगा, 

प्यार में यूं उससे मुझे फासला अच्छा लगा। 

यूं तो अक्सर प्यार में जीता था उनको हर तरह, 

जिंदगी के दांव में उसे हार जाना अच्छा लगा। 

बेखबर थी कि वह लौटकर भी आएगा कभी, 

वो न आया तो उसका फसाना अच्छा लगा।

यूं तो जाने पर कभी मैंने पुकारा भी नहीं, 

पर उसकी दास्ता में मेरा नाम आना अच्छा लगा। 

दोस्तों में यूं तो उसे मैंने किया शामिल नहीं, 

दुश्मनी में भी उस पर जां तक लुटाना अच्छा लगा। 

यूं तो खुशियों ने कभी देखा नहीं मेरी तरफ, 

पर उसकी यादों में मुझे आंसू बहाना अच्छा लगा। 

खामोश रहकर भी कभी खुद को समझाया नहीं, 

पर सजदे में उसके सर भी झुकाना अच्छा लगा। 

जाना तो था माना नहीं कि वो मेरा हमराज है, 

आज मगर इस राज से पर्दा उठाना अच्छा लगा।

जब चली थी आंधियां और बुझ गए रोशन दिये, 

तब मुझसे मोहब्बत की शम्मा जाना अच्छा लगा। 

अपने जमाने चुक गए खुशियों के खजाने लुट गए, 

तब मुझे मेरा वह दीवाना बहुत अच्छा लगा। 

बारिशों में भीग कर तड़पते रहे हम उम्र भर, 

वो जो आया पास तो सावन में नहाना अच्छा लगा।

मेरे भाव



 

वो पल मानो बीत गए


वो पल मानो बीत गए

महके-महके एहसासों में यौवन की तरुणाई में, 

प्यार जहां सच्चा होता था वो पल मानो बीत गए। 

सिंदूरी शामों के सपने रातों की तन्हाई में, 

हर पल प्यार पगा होता था वो पल मानो बीत गए। 

रिमझिम की झंकारों में सावन की फुहारों में, 

हर पल जहां संगम होता था वो पल मानो बीत गए। 

भंवरों की गुंजारो में फूलों की मुस्कानों में, 

प्रेम का गीत लिखा होता था वो पल मानो बीत गए। 

शुभ्र चांदनी रातों में महके-से मधुमासों में, 

तुम बिन सब सूना होता था वो पल मानो बीत गए।

 प्यार जहां पूजा होता था वो पल मानो बीत गए। 

सब कुछ जहां दूजा होता था वो वह पल मानो बीत गए।


गीत कोई सुनाना चाहती हूं

गीत कोई सुनाना चाहती हूं, 

मैं तुझको गुनगुनाना चाहती हूं। 

तू तो मुझमें शामिल है खुशबू बनकर, 

अपनी सांसों में तुझको समाना चाहती हूं। 

कब से चाहा है तुझे कुछ याद नहीं, 

तू मीत है मेरा बताना चाहती हूं। 

प्रेम में तेरे ऐसे खोई हूं कि, 

सावन में मोती लुटाना चाहती हूं।

 झूम कर तेरे संग-संग मैं तो, 

तुझको तुझसे चुराना चाहती हूं। 

खोई रहती हूँ ख्यालों में तेरे, 

तुझको ख्वाबों में बसाना चाहती हूं। 

बरसाती रातों में जुगनुओं की तरह, 

जीवन को तेरे सजाना चाहती हूं। 

प्यार के रंग चुरा कर तुझसे, 

हथेली पे हिना सजाना चाहती हूँ।

सुमन शर्मा

मुझे जीना नहीं आया

 लोग कहते हैं मुझे जीना नहीं आया, 

सच कहते हैं धोखे का सलीका नहीं आया। 

गैर मुमकिन था मेरा रकीब हो जाना, 

मुझे जफाओं का सफ़ीना नहीं आया। 

जब भी वो आवारगी की हद से गुजरा, 

हमको अपना दर्द छुपाना नहीं आया। 

हर बार मना लेते थे उसे रूठा जानकर, 

सच है कभी हद से गुजरना नहीं आया। 

खामोशियों को हम उनकी अदा समझ बैठे, 

हमें जुबां खामोशियों की पढ़ना नहीं आया। 

सेहरा में थे और सागर की तमन्ना कर बैठे, 

सामने जाम था मगर पीना नहीं आया। 

चाहा करते थे हरदम दिलो जान से उनको, 

मचलते रहे जज्बात पर कहना नहीं आया। 

सुमन शर्मा अजमेर

परिचय

 सुमन शर्मा, अजमेर।  शैक्षणिक योग्यता- हिंदी साहित्य व दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर, बी एड, एमजेएमसी।  अध्यवसाय व अनुभव - 16 वर्ष तक सक्रिय...