फूल का कलियों से रूठना मनाना अच्छा लगा,
प्यार में यूं उससे मुझे फासला अच्छा लगा।
यूं तो अक्सर प्यार में जीता था उनको हर तरह,
जिंदगी के दांव में उसे हार जाना अच्छा लगा।
बेखबर थी कि वह लौटकर भी आएगा कभी,
वो न आया तो उसका फसाना अच्छा लगा।
यूं तो जाने पर कभी मैंने पुकारा भी नहीं,
पर उसकी दास्ता में मेरा नाम आना अच्छा लगा।
दोस्तों में यूं तो उसे मैंने किया शामिल नहीं,
दुश्मनी में भी उस पर जां तक लुटाना अच्छा लगा।
यूं तो खुशियों ने कभी देखा नहीं मेरी तरफ,
पर उसकी यादों में मुझे आंसू बहाना अच्छा लगा।
खामोश रहकर भी कभी खुद को समझाया नहीं,
पर सजदे में उसके सर भी झुकाना अच्छा लगा।
जाना तो था माना नहीं कि वो मेरा हमराज है,
आज मगर इस राज से पर्दा उठाना अच्छा लगा।
जब चली थी आंधियां और बुझ गए रोशन दिये,
तब मुझसे मोहब्बत की शम्मा जाना अच्छा लगा।
अपने जमाने चुक गए खुशियों के खजाने लुट गए,
तब मुझे मेरा वह दीवाना बहुत अच्छा लगा।
बारिशों में भीग कर तड़पते रहे हम उम्र भर,
वो जो आया पास तो सावन में नहाना अच्छा लगा।
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