Tuesday, August 24, 2021

मुझे जीना नहीं आया

 लोग कहते हैं मुझे जीना नहीं आया, 

सच कहते हैं धोखे का सलीका नहीं आया। 

गैर मुमकिन था मेरा रकीब हो जाना, 

मुझे जफाओं का सफ़ीना नहीं आया। 

जब भी वो आवारगी की हद से गुजरा, 

हमको अपना दर्द छुपाना नहीं आया। 

हर बार मना लेते थे उसे रूठा जानकर, 

सच है कभी हद से गुजरना नहीं आया। 

खामोशियों को हम उनकी अदा समझ बैठे, 

हमें जुबां खामोशियों की पढ़ना नहीं आया। 

सेहरा में थे और सागर की तमन्ना कर बैठे, 

सामने जाम था मगर पीना नहीं आया। 

चाहा करते थे हरदम दिलो जान से उनको, 

मचलते रहे जज्बात पर कहना नहीं आया। 

सुमन शर्मा अजमेर

No comments:

Post a Comment

परिचय

 सुमन शर्मा, अजमेर।  शैक्षणिक योग्यता- हिंदी साहित्य व दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर, बी एड, एमजेएमसी।  अध्यवसाय व अनुभव - 16 वर्ष तक सक्रिय...